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Wednesday, November 20, 2019

"समय बड़ा बलवान" (चर्चा अंक- 3525)

मित्रों!
बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
चर्चा मंच निरन्तर दस वर्षों से 
ब्लॉगों की सेवा करता आ रहा है।
इस समय पाँच लोग चर्चा मंच को सजाने में निष्ठापूर्वक 
अपना महत्वपूर्ण योगदान कर रहे हैं, 
मैं उन सब का आभार व्यक्त करता हूँ।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ अद्यतन लिंक। 
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उच्चारण पर सबसे पहले देखिए, 
मेरे कुछ दोहे 
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अब देखिए हिन्दी-आभा*भारत पर 
Ravindra Singh Yadav जी का लिखा गद्यगीत 
जो हमें प्रकृति को बचाने का सन्देश देता है- 

प्रकृति को आने दो घर-द्वार 

...आओ छेड़ें सरगम के तार 
प्रकृति को आने दो घर-द्वार
सुनो बच्चों की चुलबुली पुकार
भरेगा भावुक ह्रदय  में प्यार।
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गूँगी गुड़िया पर 
अनीता सैनी जी ने ज़िंदगी के बदलते किरदार का चरित्र  
अपने ब्लॉग के कैनवास पर कुछ इस प्रकार उकेरा है- 
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अनु की दुनिया : भावों का सफ़र पर Anita Laguri "Anu" ने 
नारी जीवन की कथा-व्यथा को प्रस्तुत किया है।
बहीखाता मेरे जीवन का..!! 

एक स्त्री समेटती हैं,
अपने आँचल की गाँठ में,
 परिवार की सुख शांति,
 और समझौतों से भरी हुई
 अंतहीन तालिका... 
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कविता-एक कोशिश पर नीलांश जी की  
यह ग़ज़ल भी देखिए- 

बादल के पर्दे 

कहाँ तक जायें कि कोई किनारा कहाँ  

चुभती है सुई की घङी  मझधारा कहाँ... 

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उड़न तश्तरी ....पर कनाडा प्रवासी  
बचपन से ही मैं बाँये हाथ से लिखता था. लिखने से पहले ही खाना खाना सीख गया था, और खाता भी बांये हाथ से ही था. ऐसा भी नहीं था कि मुझे खाना और लिखना सिखाया ही बाँये हाथ से गया हो लेकिन बस जाने क्यूँ, मैं यह दोनों काम ही बांये हाथ से करता. पहले पहल सब हँसते. फिर डाँट पड़ने का सिलसिला शुरु हुआ. अम्मा हुड़कती कि लबड़हत्थे से कौन अपनी लड़की ब्याहेगा? (उत्तर प्रदेश में बाँये हाथ से काम करने वालों को लबड़हत्था कहते हैं)... 
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आहार-व्यवहार के प्रति सचेत करते हुए लिखती हैं- 
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काजल कुमार के कार्टून पर यह कार्टून भी देख लीजिए-

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Sudhinama पर Sadhana Vaid  जी ने लिखा है- 

आर पार 

आज भी खड़े हो तुम
उसी तरह मेरे सामने
एक मुखौटा अपने मुख पर चढ़ाए
नहीं समझ पाती
क्या छिपाना चाहते हो तुम मुझसे
क्यों ज़रुरत होती है तुम्हें
मुझसे कुछ छिपाने की... 
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शाश्वत शिल्प पर महेन्‍द्र वर्मा जी ने जानकारी दी है-  
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अंतर्मंथन पर डॉ टी एस दराल जी लिखते हैं- 

पत्नी पर एक गंभीर विचार विमर्श -- 

वो पास होती है तो फरमान सुनाती है।  
अज़ी ऐसा मत करना , वैसा मत करना ,  
ये मत खाना , वो मत खाना ,  
कुछ भी खाना पर ज्यादा मत खाना।  
वो दूर होती है तो समझाती है ,  
अज़ी ऐसा करना , वैसा करना ,  
ये खा लेना , वो खा लेना ,  
कुछ भी खाना पर भूखा मत रहना... 
--

आत्म रंजन पर Anchal Pandey  जी ने 
बुद्ध की परिभाषा बताते हुए लिखा है- 

जो मौन है वो बुद्ध है

करम गति को चल रहा  
परम गति को बढ़ रहा  
कुसंगति को तज रहा  
सुसंगति से सज रहा  
वो लुब्ध,क्षुब्ध मुक्त है प्रबुद्ध है वो शुद्ध है  
चैतन्य का स्वरूप है जो मौन है  
वो बुद्ध है जो मौन है वो बुद्ध है... 
--

बटुकेश्वर दत्त: एक क्रांतिकारी की दर्दनाक कहानी  
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भारतीय नारी पर Shalini kaushik जी ने 
भारत की पूर्व प्रधान मन्त्री दुर्गारूपिणी  
इन्दिरा गांधी जी के जन्मदिवस पर  
अपने उद्गार व्यक्त करते हुए लिखा है- 

भारतीय ध्रुवतारा इंदिरा गांधी 

जब ये शीर्षक मेरे मन में आया तो मन का एक कोना जो सम्पूर्ण विश्व में पुरुष सत्ता के अस्तित्व को महसूस करता है कह उठा कि यह उक्ति  तो किसी पुरुष विभूति को ही प्राप्त हो सकती है  किन्तु तभी आँखों के समक्ष प्रस्तुत हुआ वह व्यक्तित्व जिसने समस्त  विश्व में पुरुष वर्चस्व को अपनी दूरदर्शिता व् सूक्ष्म सूझ बूझ से चुनौती दे सिर झुकाने को विवश किया है .वंश बेल को बढ़ाने ,कुल का नाम रोशन करने आदि न जाने कितने ही अरमानों को पूरा करने के लिए पुत्र की ही कामना की जाती है किन्तु इंदिरा जी ऐसी पुत्री साबित हुई जिनसे न केवल एक परिवार बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र गौरवान्वित अनुभव करता है  और  इसी कारण मेरा मन उन्हें ध्रुवतारा की उपाधि से नवाज़ने का हो गया और मैंने इस पोस्ट का ये शीर्षक बना दिया... 
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Hindi Kavita Manch पर ऋषभ शुक्ला जी लिखते हैं- 

कभी तो भूल पाऊँगा... 

कभी तो भूल पाऊँगा तुमको, मुश्क़िल तो है| 
लेकिन, मंज़िल अब वहीं है||  
पहले तुम्हारी एक झलक को, कायल रहता था| 
लेकिन अगर तुम अब मिले, तों भूलना मुश्किल होगा|| 
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अन्त में देखिए- अंदाज़े ग़ाफ़िल पर  
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ जी का एक अशआर- 

जिसे आँख भर देखते हो 


जिगर देखते हो यक़ीनन मेरे सिम्त अगर देखते हो 
ज़रा ग़ुफ़्तगू भी हो उससे जिसे आँख भर देखते हो 
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16 comments:

  1. ..आओ छेड़ें सरगम के तार 
    प्रकृति को आने दो घर-द्वार
    सुनो बच्चों की चुलबुली पुकार
    भरेगा भावुक ह्रदय  में प्यार।
    ******
    चैतन्य का स्वरूप है जो मौन है  
    वो बुद्ध है जो मौन है वो बुद्ध है... 

    वैसे तो सभी रचनाएँ सराहनीय हैं , फिर भी ये दो रचनाएँ मुझे विशेष पसंद आयी हैं।
    इनमें से एक आनंद प्राप्ति के निर्मल ,निश्छल एवं कोमल प्रकृति के महत्व को रेखांकित कर रही है। मैंने भी महसूस किया कि प्रकृति का सानिध्य मानव ही नहीं हर प्राणी को आनंदित- आह्लादित करता है... विडंबना यह है कि हम मनुष्य इसका कितनी कठोरता से दोहन कर रहे हैं..।

    वहीं मौन बुद्ध बनने की प्रथम सीढ़ी है। मौन होकर ही व्यक्ति मनन कर सकता है। परंतु सिर्फ वाणी को मौन रख कर वह बुद्ध नहीं बन सकता। जब तक इस मौन का स्पर्श हृदय से होकर उसके मस्तिष्त तक नहीं पहुँचता , तब तक बुद्धत्व की प्राप्ति संभव नहीं है।
    सदैव की तरह विविध विषयों को समेटी रचनाओं से सुसज्जित मंच , शास्त्री जी आप सहित सभी को प्रणाम।


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    1. धन्यवाद जी। आपका दिन मंगलमय हो।

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    2. हार्दिक आभार आदरणीय सर।
      सादर नमन 🙏

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  2. बेहतरीन चर्चा सूत्र

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  3. सुन्दर सूत्र सार्थक चर्चा ! मेरी रचना को आज के संकलन में सम्मिलित करने के लिए आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार शास्त्री जी ! सादर वन्दे !

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  4. महत्वपूर्ण सूत्रों का समन्वय.
    आभार आपका .

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  5. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  6. विभिन्न रंगों का संयोजन किया है आपने और सब को उपयुक्त स्थान दिया है आपने, वर्तमान परिवेश के विरुद्ध चलते हुए आपने इंदिरा गांधी जी को स्थान् दिया और याद किया इसके लिए हार्दिक धन्यवाद.

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  7. आदरणीय शास्त्री जी प्रणाम, आज की सभी रचनाएं पढ़ीं। सभी अपने आप में श्रेष्ठ हैं। परन्तु मैं एक बात आप सभी से कहना चाहूँगा कि साहित्यकार छोटा हो या बड़ा, मेरी दृष्टि में यदि वह साहित्यिक पैमाने पर ग़लत है, तो है।  और उसे इंगित करना हम सभी का नैतिक कर्तव्य बनता है। क्योंकि रेल के डिब्बों की तरह मैंने चलना नहीं सीखा और न ही सीख दी है। अब आते हैं विषय पर, आपके द्वारा संकलित रचनाओं में परम आदरणीय समीर लाल जी ( उड़न तश्तरी ) की रचना में मात्रा की त्रुटियाँ इतनी ज़्यादा हैं कि मुझे बताने में भी अफ़सोस का अनुभव हो रहा है। यदि ऐसे साहित्यिकरूप से वरिष्ठजन भी इतनी ज़्यादा ग़लतियाँ करेंगे तो आप सभी विचार कर सकते हैं कि इस हिंदी साहित्य का भविष्य क्या होगा ! और ये कौन-सी फसल तैयार कर रहे हैं। ऐसे लेखकों ने अपने ब्लॉगों पर मॉडरेटर तक लगा रखा है ताकि कोई चाहकर भी उन्हें उनकी त्रुटियों का एहसास न करा सके। ग़लतियों को संक्षेप में लिखता हूँ (  विराम  चिह्न सम्बन्धी त्रुटियाँ )। ऐसी कई त्रुटियाँ हैं जिनपर हम ध्यान नहीं दे रहे हैं । अंत में मैं यही कहूँगा, "बोये पेड़ बबूल का, तो आम  कहाँ से होये ?  सादर 'एकलव्य'         

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  8. सुन्दर प्रस्तुति....
    मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका आभार|

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  9. बहुत बढ़िया संकलन। मेरी रचना को स्थान देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, आदरणीय शास्त्री जी।

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  10. लाजावाब प्रस्तुति आदरणीय सर। विविध रंग और रसो से सजा चर्चा मंच का आज का अंक भी बहुत सुंदर। सभी रचनाएँ स्वंय में श्रेष्ठ और सुंदर हैं। सभी को हार्दिक बधाई। मेरी पंक्तियों को चर्चा मंच के योग्य समझ यहाँ स्थान देने हेतु हार्दिक आभार आपका।
    आप सभी आदरणीय जनों को सादर नमन 🙏
    शुभ रात्रि

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  11. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति सर.
    मेरी रचना को स्थान देने के लिये तहे दिल से आभार.
    सादर

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  12. बहुत सुंदर प्रस्तुति आदरणीय शास्त्री जी द्वारा। चर्चामंच की टीम को प्रोत्साहित करते रहने के लिये आभार। आज की प्रस्तुति में विभिन्न प्रकार की सुंदर रचनाएँ चर्चा में सम्मिलित हुईं हैं। सभी चयनित रचनाकारों को बधाई एवं शुभकामनाएँ।

    मेरी रचना को इस प्रतिष्ठित मंच पर स्थान देने के लिये सादर आभार आदरणीय शास्त्री जी।

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"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

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