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Monday, January 18, 2021

'यह सरसराती चलती हाड़ कँपाती शीत-लहर' (चर्चा अंक-3950)

 सादर अभिवादन। 

सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।

 

यह  सरसराती चलती 

हाड़ कँपाती शीत-लहर,

झेल जाएँगे आंदोलनकारी किसान

पर देश याद रखेगा 

सरकारी क्रूरता का क़हर।

-रवीन्द्र सिंह यादव  

आइए पढ़ते हैं विभिन्न ब्लॉग्स पर प्रकाशित कुछ रचनाएँ- 

--

दोहे 

"वैज्ञानिक इस देश के धन्यवाद के पात्र" 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दुनिया में उपचार की, लगी हुई है होड़।
कोरोना का आ गया, भारत में अब तोड़।।
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रचे-बसे हैं देश में, कण-कण में रघुनाथ।
उनके पुण्य-प्रताप से, लगी सफलता हाथ।।

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एक ग़ज़ल -गमले को बोन्साई का बाज़ार चाहिए

विक्रम सा राजा हो तभी नवरत्न चाहिए 
राजा हो जैसा वैसा ही दरबार चाहिए 

कब तक दहेजमुक्त बनेगा समाज यह 
बहुओं पे जुर्म बेटियों को प्यार चाहिए 
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ज़िंदगी की चाय में उबाल देना 
सारे रंजो-ग़म अनबन की गाँठ वाली अदरक को, 
कूट-पीटकर डाल देना
--

हाहाकार मचा है भारी

नैतिकता की डोर सड़ी

उठा पटक में बापूजी की

ले भागा है  चोर छड़ी

ऐसे भारत के सपने कब

बनी विवशता अभिन्नता ।।

--

नया वर्ष आया

घरवाली के पास रखी है
चिंताओं की थैली
अम्मा ने कब से पहनी है
तन पर धोती मैली
--

अलोना स्वाद - -

जिसे लोग बरगद समझते रहे, वो
बहुत ही बौना निकला,
दूर से देखो तो लगे
हक़ीक़ी, छू के
देखा तो
खिलौना निकला, उसके तहरीरों -
से बुझे जंगल की आग,
दोबारा सुलग जाए,
जिसे अनमोल
सिक्का
--

खुल जाता मन का कठिन द्वार

सच कर देता उर का श्रिंगार


फिर पैदा होता वीर पुरूष

कर लेता जो ख़ुद पर अंकुश

--

रोशनी लाओ ज़रा | ग़ज़ल | 

डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है

धूप इक पल ही सही, लाओ ज़रा 

है अंधेरा,  रोशनी लाओ ज़रा 


आंख और पलकों के रिश्ते की तरह 

उम्र भर की दोस्ती लाओ ज़रा

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धूल की बस्ती | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह |

 नवगीत संग्रह | आंसू बूंद चुए


धूल की बस्ती

घने पांव उगाए

एक वन

ताश के पत्ते

गिनो हर ओर से

बावन

--

५२५. जाड़ों की धूप

जाड़ों की गुनगुनी धूप 
कितनी ममता-भरी है,
जब खड़ा होता हूँ,
तो हाथ रख देती है सिर पर,
सहलाती है गालों को,
जब लेटता हूँ
--
--

  उस ख्वाब को मैं भूल भी गई थी किसी उपन्यास के बीच दबाये  बुकमार्क की तरह । वहीं ख़्वाब कभी बातों बातों में तुमसे  साझा करके भी भूल गई थी ।

   आज वही पुराना उपन्यास और उसमें बुकमार्क सा दबा मेरा ख़्वाब तुमने मेरी खुली हथेली पर रख दिया है…और वह इन्द्रधनुषी तितली सा पंख फैलाये मेरी आँखों के सामने साकार है अपनी पूरी जीवन्तता के साथ । थैंक्यू…... !!!  

तुम्हारे नेह की मैं ऋणी रहूँगी युगों… युगों तक ।

--

आजकल एक न्यूज़ चैनल पर माउंट एवरेस्ट के नाम को बदलने को ले कर चर्चा चल रही है। उनके अनुसार जब इसकी ऊँचाई की सटीक गणना राधानाथ सिकदर नाम के भारतीय ने की थी, तो क्यों ना दुनिया के इस सर्वोच्च शिखर का नाम उनके नाम पर रखा जाए ! यदि ऐसा हो जाता है तो यह हम सारे भारतीयों के लिए बड़े ही गर्व की बात होगी। पर क्या यह जटिल कार्य इतना आसान है !
आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगले सोमवार। 

13 comments:

  1. सुन्दर प्रस्तुति.आभार

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  2. बहुत सुंदर लिंक्स, बेहतरीन प्रस्तुति।

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  3. रवीन्द्र सिंह जी,
    चर्चा मंच में मेरे नवगीत को शामिल करने के लिए हार्दिक आभार 🙏
    चर्चा मंच में स्थान मिलना सदा सुखद अनुभूति देता है। बहुत-बहुत धन्यवाद आपका 🙏
    - डॉ शरद सिंह

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  4. बहुत सुंदर पठनीय लिंक्स उपलब्ध कराने के लिए साधुवाद 🌹🙏🌹

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  5. आदरणीय रवीन्द्र सिंह यादव जी,
    आज की इस चर्चा में मेरी पोस्ट को आपने शामिल किया, इस हेतु मैं आपके प्रति हृदय से आभारी हूं।
    सभी लिंक्स पठनीय एवं रुचिकर हैं।
    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

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  6. आदरणीय रवीन्द्र जी,नमस्कार!रोचक और ज्ञानवर्धक विषयों को चर्चा अंक में उपलब्ध कराने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया..मेरी रचना को शामिल करने के लिए आपका हृदय से आभार व्यक्त करती हूँ..सादर नमन..

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  7. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  8. रवीन्द्र जी सम्मिलित कर सम्मान देने हेतु हार्दिक धन्यवा

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  9. बेहतरीन पठनीय सूत्रों से सजे सुंदर अंक में मेरी रचना शामिल करने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार।

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  10. बहुत सुन्दर औ सार्थक लिंकों की चर्चा प्रस्तुति।
    आपका आभार आदरणीय रवीन्द्र सिंह यादव जी।

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  11. बेहतरीन चर्चा प्रस्तुति

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  12. विभिन्न रंगों से निखरता हुआ चर्चा मंच मुग्ध करता है - - मुझे शामिल करने हेतु ह्रदय से आभार आदरणीय रवींद्र जी - - नमन सह।

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  13. सार्थक भूमिका के साथ शानदार लिंक एक साथ समेट कर लाएं हैं भाई रविन्द्र जी,सभी रचनाकारों को बधाई।
    मेरी रचना को इस गुलदस्ते में सजाने के लिए हृदय से आभार।
    सादर सस्नेह।

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