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Sunday, January 31, 2021

"कंकड़ देते कष्ट" (चर्चा अंक- 3963)

 नमस्कार मित्रों।
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
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भारत का वित्तीय बजट

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 112 में भारत के केन्द्रीय बजट को वार्षिक वित्तीय विवरण के रूप में निर्दिष्ट किया गया है, जो कि भारतीय गणराज्य का वार्षिक बजट होता है, जिसे प्रत्येक वर्ष फरवरी के पहले कार्य-दिवस को भारत के वित्त मंत्री द्वारा 

संसद में पेश किया जाता है।

स्वतंत्र भारत का प्रथम केन्द्रीय बजट 26 नवम्बर 1947 को आर.के. शनमुखम चेट्टी द्वारा प्रस्तुत किया गया था। 
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दोहे "राजनीति में हंस" 

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सारे कौए हो गयेराजनीति में हंस।
बाहर से गोपाल हैंभीतर से हैं कंस।।

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मक्कारों ने हर लिया, जनता का आराम।

बगुलों ने टोपी लगा, जीना किया हराम।।

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जब से दल-बल में बढ़ीशैतानों की माँग।
मुर्गे पढ़ें नमाज कोगुर्गे देते बाँग।।

उच्चारण  
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आर्थिक समीक्षा :  अगले वित्तवर्ष में 11 फीसदी की संवृद्धि का अनुमान 

वित्त वर्ष 2021-22 में भारत की वास्‍तविक जीडीपी वृद्धि दर 11 प्रतिशत और सांकेतिक जीडीपी वृद्धि दर 15.4 प्रतिशत रहेगी

 व्‍यापक टीकाकरण अभियानसेवा क्षेत्र में तेजी से हो रही बेहतरी और उपभोग एवं निवेश में त्‍वरित वृद्धि की बदौलत ‘V’ आकार में आर्थिक विकास होगा

 निरंतर आने वाले डेटा जैसे कि बिजली की मांगरेल माल भाड़ाई-वे बिलोंजीएसटी संग्रह और इस्‍पात के उपभोग में उल्‍लेखनीय वृद्धि के बल पर ‘V’ आकार में आर्थिक प्रगति होगी

 आईएमएफ के अनुसारभारत अगले दो वर्षों में सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्‍यवस्‍था बन जाएगा

Pramod Joshi, जिज्ञासा  
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  • "आदत" 
  • आदत सी हो गई‎ है
    अपने में‎ खो जाने की ।
    खुद से मनमानी करने की
    फिर अपने को समझाने की ।

    कल्पनाओं के कैनवास पर
    कल्पित लैण्ड स्केप सजाने की ।
    सोचों की भँवर में उलझी हुई
    अनसुलझी गिरहें सुलझाने की ।

    बेमतलब तुम से बातें कर
    बेवजह जी जलाने की ।
    टूटे दिल के जख्मों पर
    खुद ही मरहम लगाने की । 
Meena Bhardwaj, मंथन  
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न पूछिए | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह | संग्रह - सच तो ये है 

न उर्वरा धरा रही, न बांसवन रहा यहाँ 

शहर पसर के फैलता, घुटन भरी हवा यहाँ 


धुआं - धुआं है दोपहर, उदास रात क्या कहें

न पूछिए कि चांद क्यों लगे बुझा-बुझा यहाँ 

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दूसरी पारी अब भी है शेष ... 
जो चल रही है ...
ना मशाल लेकर 
राह दिखाएगा कोई ।

एक ज्योतिपुंज जो 
जल रही है भीतर तेरे 
मझधार में बन पतवार
पार लगाएगी वही ।
सधु चन्द्र, नया सवेरा  
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सर्दी में सबको प्यारी लगती धूप

देखो बिल्ली मौसी क्या पसरी खूब! 

धूप में छिपा है इसकी सेहत का राज 

बड़े मजे में है मत जाना उसके पास

बिना धूप ठण्ड के मारे सभी थरथर्राते    

मिलती जैसे ही धूप तो फूले न समाते 

नरम धूप लेकर सूरज उगा लोग सुगबुगाते  

छोड़ कम्बल-रजाई धूप सेंकने चले आते 

सुबह की धूप ठंड में सबको खूब है भाती 

  यही है भैया जो बिना भेदभाव सबको बचाती   

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आज का उद्धरण 
विकास नैनवाल 'अंजान', एक बुक जर्नल 
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दर्शन तुम्हारे 
किसी ने तुम्हें पुकारा

बहुत दिल से

पर तुमने न सुनी अरदास

ऐसा किस लिए ?

सच्चे दिल से निकली आवाज

और इन्तजार भी किया था

मगर तुम न आए

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इंसान सोशल होने के बावजूद  सबसे ज्यादा स्वयं से ही प्यार करता है  
बात पुरानी है, २००९ में जब हम पहली बार कनाड़ा गए थे, अपने एक मित्र के निमंत्रण पर। तीन सप्ताह के निवास में मित्र ने हमारे सम्मान में एक तीन दिन के जंगल कैम्प का आयोजन किया था, एल्गोंक्विन फॉरेस्ट में। लगभग ६० मिलोमीटर लम्बे जंगल के बीच से होकर एक सड़क गुजरती थी जिस के किनारे जंगल में बने एक कैम्पिंग लॉज में हमारा कैम्प आयोजित किया गया था। घने जंगल के बीचोंबीच बने कैम्पिंग साइट पर हमारे टेंट लग गए।  कुल मिलाकर हम ५ परिवारों के लगभग २० लोग थे बच्चों समेत। जंगल में भालू पाए जाते थे।  इसलिए केयरटेकर की ओर से निर्देश था कि खाने का कोई भी सामान खुले में न रखा जाये क्योंकि भालू खाने की गंध से आकर्षित होते हैं और हमला कर सकते हैं। 
डॉ टी एस दराल, अंतर्मंथन 
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बहा करो उन्मुक्त पवन सम 

जीवन का संगीत उपजता, 

मिले-जुले सब तत्व दे रहे 

संसृति को अनुपम समरसता !


हर कलुष मिटाती कर पावन

चलती फिरती आग बनो तुम, 

अपनेपन की गर्माहट भर 

कोमल ज्योतिर राग बनो तुम !

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और हम बाकी लोगों का क्या ? 
अब इस वक़्त यह सब लिखते हुए एक और ख्याल आया कि यह तो एक ब्लॉग है जो इतना  आसानी से इस मुद्दे पर लिख पा रही हूँ, यदि कहीं ऐसी दो  लाइन कहीं फेसबुक पर लिख डाली होती तो  लोग सवाल जवाब का पूरा  संसार ही रच डालते।  यह रचनात्मक स्वतंत्रता इंसान को कुछ कोना उपलब्ध करवा देती है अपनी बात  कहने का।यह रचनात्मक स्वतंत्रता इंसान को कुछ कोना उपलब्ध करवा देती है अपनी बात  कहने का। यह सोशल मीडिया के ज़रिये पिछले दो तीन दशकों से इंसान को जितने ज्यादा प्लेटफार्म मिले खुद को अभिव्यक्त कर सकने के या अपनी बात को दूर तक पहुंचा सकने के, उतना ही ज्यादा सिमट गया कही गई बातों का अर्थ।  जब दुनिया की हर चीज़ टेम्पररी हो चली  है, वायरल सेंसेशन की तरह सिर्फ कुछ घंटे या दिन का मामला रहा तब भी इंसान तलाश कर रहा है कि व्हाट अबाउट रेस्ट ऑफ़ अस ??? जब कहीं कोई अतिमानव भी यही पूछ रहा है कि No Claim ?? इन अधूरी छूटती जा रही कहानियों को पूरा होना चाहिए या नहीं ! 
Bhavana Lalwani, Life with Pen and Papers  
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उदास मौसम 
फरवरी का महीना ख़ुद में ही सारे रंगों से सराबोर होता है और इस समय प्रकृति धरती को नए सौंदर्य से भर देती है । पेड़ों और पौधों में नयी कोपलें फूटती हैं, आम के पेड़ बौरों से लद जाते हैं, खेत सरसों के फूलों से भरे पीले दिखाई देते हैं अतः राग रंग और उत्सव मनाने के लिए मन भी उत्साहित होता है ।मन के गलियारे में भी भावनाओं की नयी लहर भी उम्र के साथ दस्तक देती है ।
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बन्द चौराहें 

 यह कविता ऐसी सत्य घटना पर आधारित है जिसमे एक बूढा व्यक्ति काम की तलाश में भटक रहा है।लेकिन उसे काम नही मिलता तो उसकी क्या अवस्था है।आशा है ये मार्मिक रचना आप सब को पसन्द आएगी

Satish Rohatgi, स्वरांजलि  
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आकाशवाणी को समर्पित एक ग़ज़ल - रेडियो भी तो परिंदो सी उड़ानों में रही 

नज़्म में ,गीत में ,गज़लों में फ़सानों में रही 

रेडियो भी तो परिंदो सी उड़ानों में रही 

इसके परिधान का हर रंग लुभाता है हमें 

बांसुरी ,तबला ये करताल ,पियानों में रही 

जयकृष्ण राय तुषार, छान्दसिक अनुगायन 
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रामः रामौ रामा: ... 

रामः रामौ रामा: ...

यूँ तो खींच ही लाते हैं एक दिन बाहर

रावण को हर साल पन्नों से रामायण के

और .. मिलकर मौजूदगी में हुजूम की 

जलाते हैं आपादमस्तक पुतले उसके । 

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देख के अनजान 
गुज़रो यहाँ से यूँ जैसे सब
कुछ देख के, कुछ भी
देखा नहीं, सत्य
सुन्दर है
बहुत,
लेकिन उसमें छुपा है विष
का प्याला,  
Shantanu Sanyal शांतनु सान्याल, अग्निशिखा  
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लकड़ी की राख से साक्षात्कार  (interview with wood ash) 
मैं सोचने लगी कि हम इंसान तो ''अपना टाइम आएगा...अपना टाइम आएगा...'' ऐसा गा गा कर खुद को तसल्ली दे रहे है। और ये राख है जो गा रही है, "आज मैं ऊपर, आसमाँ नीचे, आज मैं आगे, जमाना है पीछे...."

दोस्तों, मुझे यह बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि "आपकी सहेली" यह 500 वी पोस्ट है। आशा है, मुझे आपका स्नेह, सहयोग और आशीर्वाद यूं ही मिलता रहेगा। 
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आज के लिए बस इतना ही।
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11 comments:

  1. खूबसूरत ब्लॉग लिंक्स |आपको बधाई और हार्दिक शुभकामनायें

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  2. बेहतरीन संकलन

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  3. आदरणीय डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी
    सादर अभिवादन 🙏
    कितनी सारी बेहतरीन लिंक्स आपने संयोजित की हैं ! वास्तव में श्लाघनीय कार्य है यह... साधुवाद 🙏
    मेरी पोस्ट को सम्मिलित कर आपने मुझे भी जो मान दिया है उसके प्रति मैं आपकी हृदय से आभारी हूं।
    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

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  4. खूबसूरत संकलन|मेरी पोस्ट को शामिल करने के लिए आभारी हूं

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  5. मेरी रचना को यहां विद्वानों के सामने रखने के लिए आपका हृदय से आभार

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  6. सुन्दर और सराहनीय चर्चा प्रस्तुति । मेरे सृजन को संकलन में स्थान देने के लिए हार्दिक आभार सर!

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  7. उम्दा चर्चा। मेरी रचना को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, आदरणीय शास्त्री जी।

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  8. बेहतरीन रचना संकलन एवं प्रस्तुति सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं मेरी रचना को स्थान देने के लिए सहृदय आभार आदरणीय 🙏 सादर

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  9. विविध रंगों से ओतप्रोत चर्चा मंच मुग्ध करता हुआ, सभी रचनाएं अपने आप में हैं असाधारण, मुझे जगह देने हेतु असंख्य आभार माननीय शास्त्री जी - - नमन सह।

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  10. मेरी पोस्ट शामिल करने हेतु आभार!

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